नज़रे मुबारक 17
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*🥀 हमारे ग़ौसे आज़म رضی اللہ عنہ 🥀*
*पोस्ट 17*
*✏️ नज़रे मुबारक*
🔮 सरकारे गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु मजमे में जिस पर पर अपनी मुकद्दस आंखों से तवज्जोह फ़रमाते वह कैसा ही सख़्त तबीयत संगदिल क्यूँ न होता मुतीअ व फरमाबरदार और आपका गुलाम बन जाता!
🦃 चुनांचे हज़रते शैख़ मकारिम रदियल्लाहु तआला अन्हु का बयान है कि मैं एक दिन हज़रते शैख़ अब्दुल कादिर रदियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िदमते आली में उनके मदरसे में हाज़िर था कि उसी दौरान फ़ज़ा में तीतर परिन्दा उड़ता हुआ गुज़रा ! हज़रते शैख़ मकारिम कहते हैं कि मेरे दिल में ख़्याल आया कि क्या ही अच्छा होता कि मैं तीतर का गोश्त जौ के साथ खाता! इस ख्याल के आते ही हज़रते शैख़ अब्दुल कादिर जीलानी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए और फ़ज़ा की तरफ़ निगाहे मुबारक उठाई! इतने में तीतर मदरसे के सहन में आ गिरा और दौड़ कर मेरी रान पर सवार हो गया! सरकारे गौसे आज़म ने फ़रमाया ऐ मकारिम तुम्हें जिस चीज़ की ख्वाहिश है वह ले' लो! अल्लाह तआला तुमसे तीतर को जौ के साथ खाने की ख्वाहिश छीन लेगा! उस वक्त से आज के दिन तक तीतर के गोश्त से मेरी नफ़रत का यह आलम है कि अगर उसे भून पका कर मेरे सामने रखा जाए तो मैं उसकी महक भी बर्दाश्त नहीं कर सकता हालांकि इससे पहले तीतर मुझे बहुत ज्यादा पसन्द था!
*(📚हमारे ग़ौसे आज़म सफ़ह,188)*
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*🥀 हमारे ग़ौसे आज़म رضی اللہ عنہ 🥀*
*पोस्ट 18*
*✏️ सय्यिदुना ग़ौसे आज़म रदिअल्लाहु तआला अन्हु की तशरीफ़ आवरी के मुबारक हालात*
तारीख़ की मोअतबर (इतिहास की ऐतिबार के क़ाबिल) किताबों में बताया जाता है कि एक मर्तबा एक अल्लाह वाले दरियाए दजला के किनारे किनारे चला जा रहा थे कि अचानक दरिया में बहता हुआ एक सेब नज़र आया उस अल्लाह वाले ने सेब को दरिया से निकाल लिया क्यूँकि उन्हें भूक लगी हुई थी इसलिए बे-सोचे समझे उस सेब को खा लिया और चल दिए मगर कुछ दूर ही गए थे कि दिल ने कहा कि यह सेब मालूम नहीं किसका है और तूने बग़ैर पूछे हुए खा लिया।
अब अगर अल्लाह तआला ने कियामत के दिन पूछा तो क्या जवाब दोगे ? यह ख़्याल आते ही सेब के मालिक से माफ कराने या कीमत देने के लिए उस तरफ चल पड़ जिधर से सेब आया था। यहाँ तक कि चलते चलते एक बाग़ में पहुँचे जिसकी डालियाँ दरिया की तरफ झुकी हुई थीं।
उस अल्लाह वाले ने ख़्याल किया कि जिस सेब को हमनें खाया है वह इसी बाग़ का होगा। तो उस अल्लाह वाले ने बाग़ वाले का पता मालूम किया तो मालूम हुआ कि यह बाग़ हज़रते अब्दुल्लाह सूमई का है।
👉🏻चुनांचे वह अल्लाह वाला हज़रते शेख अब्दुल्लाह सूमई की बारगाह में हाज़िर हुआ और सेब खाने का वाकिया बता कर सेब की कीमत लेने या माफ़ करने के लिए अर्ज किया। हज़रते शैख अब्दुल्लाह सूमई ने फरमाया कि बेटा सेब की कीमत बहुत ज्यादा है तुम अदा नहीं कर सकते लेकिन अल्लाह वाले ने कीमत के अदा करने का जब जोरदार तरीके से इकरार किया तो हज़रते शैख़ अब्दुल्लाह सूमई ने फरमाया कि उस सेब की कीमत यह है कि तुम मेरे बाग़ की एक साल रखवाली करो।
चुनांचे उस अल्लाह वाले ने बाग़ की रखवाली शुरू कर दी और पूरे दो साल तक रखवाली करते रहे। एक दिन हज़रते शैख अब्दुल्लाह सूमई ने फरमाया बेटा सेब माफ करवाने के लिए तुम्हें एक काम और करना होगा और वह यह कि तुम मेरी बेटी से शादी करो जो दोनों आंखों से अन्धी है,दोनों कानों से बहरी है,दोनों हाथों से लूली है,दोनों पैरों से लंगड़ी है और ज़बान से गूंगी भी है। उस अल्लाह वाले ने सेब माफ़ करवाने के लिए ऐसी लड़की से शादी करने के लिए भी इक़रार कर लिया।
👉🏻चुनांचे हज़रते शैख अब्दुल्लाह सूमई ने अपनी बेटी की शादी उस अल्लाह वाले के साथ कर दी। लेकिन जब वह अल्लाह वाला अपनी बीवी के कमरे में गया तो बहुत हैरान हुआ क्यूँकि उस कमरे में बहुत ही हसीनो जमील और ख़ूबसूरत औरत मौजूद थी। वह अल्लाह वाला उल्टे कदम कमरे से निकल आया और हज़रते शैख़ अब्दुल्लाह सूमई के पास हाज़िर होकर कहा कि आपने जिस लड़की की शादी मुझसे की थी वह लड़की उस कमरे में नहीं हैं बल्कि दूसरी है।
अब हज़रते शैख अब्दुल्लाह सूमई ने फरमाया कि बेटा वही तुम्हारी बीवी है और मैंने जो कुछ तुमसे कहा था उसका मतलब यह है कि उस लड़की ने कभी भी अपनी ज़बान से शरीअत के ख़िलाफ़ कोई बात नहीं की इसलिए वह गूंगी है,उसने अपने कानों से कोई बुरी बात न सुनी इसलिए वह बहरी है,उसने कभी अपनी आंखों से किसी गैर महरम को नहीं देखा है इसलिए वह अन्धी है,उसने अपने हाथों से कभी कोई ग़लत काम न किया इसलिए वह लूली है और वह कभी अपने पैरों से किसी गुनाह की तरफ नहीं बढ़ी इसलिए वह लंगड़ी है।
✅उस मुक़द्दस ख़ातून का मुबारक नाम सय्यिदा फतिमा है और कुन्नियत उम्मुल ख़ैर है और लकब शरीफ अमतुल जब्बार है और उस अल्लाह वाले का मुबारक नाम इब्ने अब्दुल्लाह है और कुन्नियंत अबू सालेह है और लक़ब जंगी दोस्त है।
✅इन्हीं दोनों मुबारक और अल्लाह वालों के ज़रिए हकीकतो मारिफ़त और शरीअतो तरीकत का एक ऐसा महकता हुआ फूल खिला जिसने सारे आलम को अपनी ख़ुशबू से महका दिया जो ग़ौसियत और कुतबियत का ताजवर बन कर विलायत के आसमान पर चाँद व सूरज की तरह जगमगाया और क़ियामत तक जगमगाता रहेगा जिसे दुनिया ने *"ग़ौसे आज़म"* के मुक़द्दस लकब से जाना और पहचाना। वल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन।..
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