सरकारे ग़ौसे आज़म की तालीमात* 19
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*🥀 हमारे ग़ौसे आज़म رضی اللہ عنہ 🥀*
*पोस्ट 19*
*✏️ सरकारे ग़ौसे आज़म की तालीमात*
#01 *जुहद व वरा* सरकारे ग़ौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि ज़ुहद व वरा यह है कि आदमी तमाम चीज़ों से परहेज़ करने लगे,शरीअते मुतहहरा जिस चीज़ और जिस काम की इजाज़त दे उसे इख़्तियार करे और जिन कामों और जिन चीज़ों से रोके उसे छोड़ दे। जुहद व वरा के तीन दर्जे होते हैं।
*(1)* अवाम का वरा
*(2)* ख़वास का वरा
*(3)* ख़्वासुल ख्वास का वरा
ख़वास का जुहद यह है कि ख़्वाहिशाते नफ़सानी की तमाम चीज़ों से परहेज़ किया जाये।
ख़वासुल ख्वास का जुहद यह है की बन्दा हर उस शय से जिस का वह कस्द (इरादा) कर सकता है परहेज़ करता रहे।
वरा की दो किस्म हैं।
*(1)* ज़ाहिरी वरा
*(2)* बातिनी वरा
*(1)* ज़ाहिरी वरा तो यह कि अल्लाह के हुक्म के सिवा कोई काम और कोई बात न कहे।
*(2)* बातिनी वरा यह है कि कल्ब में अल्लाह तआला के सिवा किसी दूसरे का ख़याल भी न गुज़रे। जिस शख़्स के पेशे नज़र वरा की यह बारिकयाँ नहीं हैं वह इन मरातिबे आलिया तक नहीं पहुँच सकता जुहद वरा की पहली मंज़िल है जो कनाअत के रज़ा की पहली मन्ज़िल है। वरा के असर का दाइरा इतना फैला हुआ है कि खाने पीने उठने बैठने तमाम चीज़ों से मुतअल्ल्कि है। चुनांचे मुत्तकियों का खाना पीना भी आम इन्सानों के ख़िलाफ़ होता है।
*👉🏻वरा का हुसूल :-* सरकारे गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाते हैं कि उस वक्त तक वरा कामिल नहीं हो सकता जब तक अपने लिए इन दस सिफ़ाते आलिया (बलन्द ख़ूबियाँ) की पाबन्दी ज़रूरी न करार दे ली जायें।
*(1)* ज़बान को काबू में रखना।
*(2)* ग़ीबत से परहेज़ करना।
*अल्लाह तआला का फरमान है :-* कोई तुम में एक दूसरे की ग़ीबत न करे।
*(3)* किसी भी आदमी को अपने से हकीर न जाने
*अल्लाह तआला का फरमान है:-* कि एक कौम दूसरी कौम की हंसी न उड़ाए शायद वह उससे बेहतर हो।
*(4)* ग़ैरमहरम (जिससे निकाह जाएज़ हो) पर नज़र न डाले।
*अल्लाह तआला का फरमान है :-* ऐ महबूब तुम फरमा दो मुसलमानों से अपनी अपनी निगाहें नीची रखा करें।
*(5)* सच्चाई अल्लाह का फरमान है जब तुम कोई बात कहो तो सच कहो और इन्साफ की कहो।
*(6)* इनामात व एहसानात को मानता रहे ताकि नफ़्सपरस्ती व गुरूर में मुबतला होने से महफ़ूज़ रहे।
*अल्लाह का फरमान है:-* अल्लाह ही ने तुम्हारे ऊपर यह एहसान फ़रमाया है कि उसने तुम्हें ईमान की दौलत दी। हमारे ऊपर अल्लाह का एहसाने अज़ीम है कि उसने हमें दौलते ईमान बख़्शी।
*(7)* माल व दौलत राहे ख़ुदा में खर्च करता रहे।
*अल्लाह का फरमान है:-* वह लोग जब खर्च करते हैं तो न फुजूलखर्ची करते हैं और न कंजूसी करते हैं। वह अपना माल गुनाह में नहीं ख़र्च करते अलबत्ता नेक रास्ते में खर्च करने से बाज़ नहीं रहते।
*(8)* अपनी ही जात के लिए भलाई को न चाहे और गुरूर व तकब्बुर से बचा रहे।
*अल्लाह तआला फ़रमाता है:-* जन्नत में उन्हीं लोगों को जगह दूंगा जो दुनिया में अपनी बरतरी के ख्वाहाँ (चाहने वाला) नहीं होते हैं और फसाद करने वाले काम नहीं करते।
*(9)* पंजवक्ता नमाज़ की पाबन्दी करना।
*अल्लाह तआला का फ़रमान है:-* नमाज़ों की हिफाज़त करो ख़ासकर नमाज़े अस्र की और कमाले आजिज़ी के साथ रब की बारगाह में खड़े हुआ करो।
*(10)* सुन्नते नबवी और इजमाए मुस्लेमीन का इहतराम करो यानी सहाबए किराम और औलियाए इज़ाम की बातों का अदब करो।
*अल्लाह का फरमान है:-* बेशक यह मेरी सीधी राह है तुम इसकी पैरवी करते रहो।
सरकार गौसे आज़म रदिअल्लाहु तआला अन्हु ने यह दस सिफात वरा के कामिल होने के बारे में बयान फ़रमाई हैं। यही वह अहम ख़ूबियाँ हैं जिन पर इस्लामी तसव्वुफ़ की मज़बूत बुनयाद काइम है जिन के हासिल हो जाने के बाद एक इन्सान इन्साने कामिल बन जाता है।
ख़ुदा वन्दा आजकल के सूफियों को तौफीक अता फरमा कि इन हिदायात पर अमल कर के अपने ऊपर ज़ुहद और वरा को मुकम्मल फ़रमा लें।
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