पीरे कामिल 20

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*🥀 हमारे ग़ौसे आज़म رضی اللہ عنہ 🥀*



*पोस्ट 20*



*✏️ पीरे कामिल :-* 

पीरे कामिल वह है जो अपने सामने तुम्हारे दिल को सुकून से रखे और अपनी पीठ पीछे भी तुम्हें महफ़ूज़ रखे और अपने आदाब व अख़लाक़ के ज़रिए तुम्हारी तरबियत करता रहे। और तुम्हारे बातिन को रौशन करे। मुरीद वह है जो हर हाल में तवाज़ो इख़्तियार करे फकीरों के साथ महब्बत रखे। सूफियाए किराम के साथ अदब व अच्छे अख़लाक़ से उलमा के साथ उनकी नेक बातों पर अमल करने से अहले मारिफ्त के साथ सुकून व वकार से और औलियाए किराम को मानने के साथ साथ अल्लाह को एक जानता रहे। 
*वज्दे हकीकी:-* सरकारे गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं जो वज्द (यादे इलाही में मस्त हो जाना) मुशाहदा यानी दिल की आंखों से अल्लाह का दीदार करने से ख़ाली हो वह झूट है। वज्द करने वालों की रूहें निहायत साफ़ और सुथरी होती हैं। उनकी गुफ्तगू मुर्दा दिलों को ज़िन्दा करती है और अक़्ल को ज़्यादा करती है। बहुत सी जगहों को एक मकान और बहुत सी हक़ीक़तों को एक हक़ीक़त बना देती है। वज्द की शुरूआत अल्लाह तआला की तरफ से पर्दे का उठ जाना है। वज्द करने वाले को अल्लाह तआला के हुस्न का दीदार और ग़ैब के भेदों का इल्म हासिल होता है। जिस वज्द से बशरियत ख़त्म न हो वह वज्द नहीं। वज्द के दो मरतबे हैं नाज़िर यानी देखने वाले का मरतबा और मन्जूर इलैह यानी जिसको देखा जाए उसका मरतबा। नाज़िर से मुशाहदा का मरतबा मुराद है। मन्जूर इलैह के मरतबे से ग़ैब का मरतबा मुराद है। 
*मारिफत और अल्लाह तआला की महब्बत :-* ग़ौसे आज़म रदिअल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जो शख़्स महब्बते इलाही की शराब पी लेता है उसका नशा महबूब के दीदार के बग़ैर नहीं उतरता गोया महब्बते इलाही ऐसी शराब है जिसकी सुबह महबूब के हुस्न का मुशाहदा है यानी अल्लाह की महब्बत का नशा ऐसा है कि जब तक उसकी तजल्लियों का दीदार न होगा यह नशा नहीं उतरेगा जैसे सिक एक ऐसा दरख़्त है जिसका फल मुजाहदा और रियाज़त है। 
       महब्बत के तीन उसूल हैं वफा,अदब और मुरव्वत। वफा यह है कि अल्लाह की वहदानियत में मशगूल रहे अपने दिल को सबसे जुदा कर ले और सिर्फ उसी के नूरे अज़ल से दिल मानूस हो जाए। अदब यह है किं वक्तों की हिफाज़त करता रहे और अल्लाह तआला के सिवा हर चीज़ से अलग होता रहे। मुरव्वत यह है कि बात और काम में सच्चाई और दिल की सफाई के साथ अल्लाह के ज़िक्र पर काइम रहे। खुले और छुपे तौर में ग़ैरों से चेहरा फेर ले यानी अलग हो जाए। जब बन्दा में यह तीनों आदतें जमा हो जाती हैं तो अल्लाह तआला के विसाल की लज्ज़त पाने लगता है और बन्दे के दिल में शौक की आग भड़क उठती है। 



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