इन्सान का पैदा करना 23

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*🥀 हमारे ग़ौसे आज़म رضی اللہ عنہ 🥀*



*पोस्ट 23*



*✏️ इन्सान का पैदा करना :-* 

सरकारे गौसे आज़म रदिअल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं सुब्हानल्लाह उस ख़ालिके कौनो मकाँ ने इन्सान को किस उम्दा और बेहतरीन सूरत में पैदा किया। इस कमज़ोर बुनयाद के वजूद में अपनी क्या क्या हिकमतें दिखलाई। अगर इन्सान में अपनी ख़्वाहिशों की पैरवी करने की आदत न हो तो वह अपनी फ़ज़ीलत की वजह से बहुत ही अकमल व आला है। अगर इन्सान में कसाफ़ते तबई (पैदाइशी भारीपन) न होती तो वह एक ऐसा ख़ज़ाना है जिसमें ग़ैब और राज़ और तमाम किस्म के कमालात अमानत रखे गए हैं। 
      इन्सान का वुजूद एक मकान है जो नूर और तारीकी दोनों से भरा हुआ है। फ़िरिश्तों पर उसकी फ़ज़ीलत ने उसे बुज़ुर्गी का ताज पहनाया है। इन्सान के जिस्म का सदफ (सीप) रूहानी मोतियों से भरा हुआ है। वुजूद के दरिया में इल्म की कश्तियाँ लदी हुई हैं और वो कश्तियाँ हवाए रूह के ज़रिए रियाज़त और मुजाहदा की तरफ जा रही हैं। इन्सान के वुजूद के मैदान में अक़्ल का बादशाह नफ्स के बादशाह के ऊपर खड़ा है और दोनों लश्कर सीने में बड़ी जवाँमर्दी के साथ एक दूसरे के मुकाबले के लिए तैयार हैं। नफ्स के बादशाह के लश्कर का सरदार इब्लीसे लईन है और अक्ल के बादशाह के लश्कर का सरदार रूह है। इन दोनों लश्करों की तैयारी के बाद अल्लाह तआला के हुक्म के मुअज्ज़िन ने पुकार कर कह दिया है ऐ लश्करे इलाही के जवाँ मर्दो आगे बढ़ो और नफ़्स के बादशाह के लश्कर के बहादुर सामने आओ फिर लड़ाई शुरू कर दी। 
ये हुक्मे इलाही जारी होने के बाद दोनों लश्कर लड़ने लगते हैं और दोनों तरफ से एक दूसरे पर फतह पाने की गर्ज से तरह तरह के मक़्र और हीले किए जाते हैं। 
👉🏻उसी वक्त तौफीके इलाही भी ज़बाने हाल से पुकार कर दोनों लश्करों से कह देती है कि मैं जिसकी मदद करूंगी फतह का मैदान उसी के हाथ होगा और दुनिया और आख़िरत में वही नेकबख़्त कहलाएगा। 
👉🏻मुसलमानो अक़्ल की पैरवी करो ताकि तुम्हें हमेशा वाली नेकबख़्ती हासिल हो,नफ़्स की पैरवी को छोड़ दो और कुदरते इलाही पर गौर करो कि अल्लाह तआला ने जिस्म के साथ रूह को जो आसमानी है और आलमे अरवाह से आई है। तुम्हें ऐसी ज़िन्दगी बसर करनी चाहिए कि रूह का पाकीज़ा परिन्दा अल्लाह तआला की इनायत के बाज़ूओं से उड़ता हुआ जिस्म के भारी भरकम पिंजरे को छोड़ कर अल्लाह तआला की बारगाह के दरख़्त में अपना आशयाना बना ले और कुर्बे इलाही की शाख़ों पर बैठ कर शौक की ज़बान से चहचहाए। 
मारिफत के मैदान से जवाहिराते हक़ाइक चुने और जिस्म को वजूद की तारीकी में पड़ा रहने दे फिर जिस्मे ख़ाकी फ़ना हो जाएगा और कुल्ब के राज़ जाहिर होने लगेंगे। अगर अल्लाह तआला की तौफीक एक लम्हा भी तुम्हारे शामिले हाल हो जाए तो उसकी एक तवज्जोह की नज़र ही तुम्हें अर्श तक पहुँचा देगी और तुम्हारे दिल में उलूम की हक़ीक़तें भर कर उसे यानी दिल को मारिफत के राज़ों का खज़ाना बना देगी। उस वक़्त तुम्हें दिल की आंखों से अल्लाह तआला का हुस्न नज़र आएगा। 



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